ये ‘अव्यावहारिक’ ही नहीं ‘अलोकतांत्रिक’ भी है।कभी-कभी सरकारें समयावधि में भी अस्थिर हो जाती हैं।तो क्या जनता बिना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के रहेगी। इसके लिए चुनी सरकारों को बीच में भंग करना होगा। जो जनमत का अपमान होगा. ‘एक देश, एक चुनाव’ लोकतंत्र के ख़िलाफ़ षड्यंत्र है।जो चाहता है एक साथ पूरे देश पर क़ब्ज़ा कर लें। इससे चुनाव दिखावटी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा जो सरकार बारिश, पानी, नहान के नाम पर चुनाव टालती है वो एक साथ चुनाव कराने का दावा कैसे करती है। ‘एक देश, एक चुनाव’ एक छलावा है! ‘ये चुनावी व्यवस्था के सामूहिक अपहरण की साजिश है’…’एक देश, एक चुनाव’ सही मायनों में एक ‘अव्यावहारिक’ ही नहीं ‘अलोकतांत्रिक’ व्यवस्था भी है क्योंकि कभी-कभी सरकारें अपनी समयावधि के बीच में भी अस्थिर हो जाती हैं तो क्या वहाँ की जनता बिना लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के रहेगी। इसके लिए सांविधानिक रूप से चुनी गयी सरकारों को बीच में ही भंग करना होगा, जो जनमत का अपमान होगा।
दरअसल ‘एक देश, एक चुनाव’ लोकतंत्र के ख़िलाफ़, एकतंत्री सोच का बहुत बड़ा षड्यंत्र है। जो चाहता है कि एक साथ ही पूरे देश पर क़ब्ज़ा कर लिया जाए। इससे चुनाव एक दिखावटी प्रक्रिया बनकर रह जाएगा। जो सरकार बारिश, पानी, त्योहार, नहान के नाम पर चुनावों को टाल देती है, वो एक साथ चुनाव कराने का दावा कैसे कर सकती है।
‘एक देश, एक चुनाव’ एक छलावा है, जिसके मूल कारण में एकाधिकार की अलोकतांत्रिक मंशा काम कर रही है। ये चुनावी व्यवस्था के सामूहिक अपहरण की साजिश है।