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लखनऊ। शहर में जल संकट गहराता जा रहा है। नलों से गंदा पानी, जगह-जगह लीक होते पाइप और शिकायतों का अंबार – जलकल विभाग लखनऊ की कार्यप्रणाली पर पहले ही कई सवाल खड़े हो चुके हैं। लेकिन अब जो खुलासा हुआ है, वह विभाग की लापरवाही और भ्रष्टाचार की नई इबारत लिख रहा है।
लखनऊ के जलकल विभाग जोन-8 के एलडीए कॉलोनी डी-1 नलकूप से पानी तो कितना निकलता है, यह तो उपभोक्ताओं को ही बेहतर पता होगा, लेकिन वहां से ई-रिक्शा जरूर चार्ज हो रहे हैं। तीन ई-रिक्शा खुलेआम सरकारी बिजली से अपनी बैटरी फुल कर रहे थे। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है – यह तो रोज का मामला है।
बिजली मुफ्त, धंधा जबरदस्त!
गौर करने वाली बात यह है कि नलकूपों का बिजली बिल जलकल विभाग खुद चुकाता है, यानी जनता के पैसे से। लेकिन ठेकेदारों या विभाग के कर्मचारियों की मिलीभगत से यहां ई-रिक्शा वालों से अवैध वसूली कर चार्जिंग पॉइंट बना दिया गया है। मतलब – बिजली सरकारी, मुनाफा ठेकेदारों का!
स्थानीय लोग आरोप लगा रहे हैं कि यहां ई-रिक्शा खड़ा करवाने तक का पैसा वसूला जाता है। यानी, यह सिर्फ बिजली चोरी नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की खुली लूट है। लेकिन विभाग के अफसरों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही।
महाप्रबंधक ने प्रधानमंत्री मोदी का सपना किया साकार, लोगों को मिला स्वरोजगार!
जलकल महाप्रबंधक कुलदीप सिंह ने अनजाने में ही प्रधानमंत्री मोदी के आत्मनिर्भर भारत के सपने को साकार कर दिया है! साफ पानी देने में असफल जलकल विभाग अब ई-रिक्शा चालकों को चार्जिंग सुविधा देकर स्वरोजगार उपलब्ध करा रहा है। मुफ्त बिजली, ठेकेदारों की कमाई और ई-रिक्शा चालकों को बिना खर्च चार्जिंग – मानो जलकल विभाग ने नई योजनाओं को अमलीजामा पहना दिया हो!
महाप्रबंधक से संपर्क असंभव, समाधान भी असंभव!
जलकल विभाग के महाप्रबंधक कुलदीप सिंह की कार्यशैली भी सवालों के घेरे में है। शिकायतों का अंबार लग चुका है, लेकिन समाधान नदारद। जब महापौर सुषमा खर्कवाल का फोन 9 मिनट तक इंटीग्रेटेड कमांड सेंटर में नहीं उठा, तो आम जनता का क्या हाल होता होगा? महापौर ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि महाप्रबंधक को सभी का फोन उठाना चाहिए, सिर्फ अपने चहेतों का नहीं।
अब सवाल यह है कि जब नलकूपों से पानी की जगह बिजली का मुफ्त वितरण हो रहा हो, और अधिकारी फोन उठाने तक को तैयार न हों, तो जनता किससे उम्मीद करे? जलकल विभाग लखनऊ की कमान कमजोर हाथों में है या फिर किसी खास रणनीति के तहत यह सब चल रहा है?
अब देखने वाली बात यह होगी कि नगर निगम की मुखिया इस घोटाले पर क्या कार्रवाई करती हैं, या फिर यह भी किसी और घोटाले की तरह फाइलों में दफन हो जाएगा?